लेकिन वहाँ भी जाति और धर्म की राजनीति में एक अहम भूमिका है.
केरल में कुल आबादी के लगभग 24 प्रतिशत इसाई हैं और स्वभाविक तौर पर यहां की राजनीति में इस संप्रदाय का असर भी है.
केरल में ये समुदाय अल्पसंख्यक अवश्य हैं, पर अपेक्षाकृत संपन्न हैं. प्लांटेशन, काँफी उद्योग और बड़े लाँबी से यहां के इसाई जुड़े हैं.
आर्थिक हित
हिंदू अखबार के पत्रकार गौरी वासन नायर कहते हैं, ''ईसाई समुदाय के आर्थिक हित यहाँ बड़े हैं और इनकी रक्षा के लिए चर्च की भूमिका यहां के चुनावों में बड़ी अहम रहती है.''
चर्च सीधे तौर पर चुनाव में हस्तक्षेप नहीं करता, पर एक सुनियोजित तरीक़े से चुनाव में किसी उम्मीदवार या पार्टी को चर्च का समर्थन मिलता है.
गौरी-वासन नायर कहते हैं कि चर्च का समर्थन यहां आमतौर पर कांग्रेस के मोर्चे यूडीएफ या संयुक्त जनतांत्रिक मोर्चा को मिलता रहा है.
तिरुवनंतपुरम के आर्च बिशप सिरिल मार बेसीलियोस भी केरल के चुनावों में चर्च की भूमिका को स्वीकार करते हैं.
वे कहते हैं, ''चर्च सीधे तौर पर राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करता, पर चर्च से जुड़े लोगों को भी राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल होना चाहिए, चर्च का काम इंसान की बेहतरी के लिए काम करना है, और राजनीति इंसान के जीवन का अंग है.''
केरल में चर्च का समर्थन कांग्रेस को बेशक मिलता रहा हो पर कई बार वाममोर्चा ने भी इस वोट-बैंक में सेंध मारी है.
वाममोर्चा ने कई बार चर्च से जुड़े लोगों को टिकट दिया है तो कई बार स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर भी उनका समर्थन किया है, इस बार भी वाममोर्चा ने एर्नाकुलम और अल्लपी में ये चाल चली है.
चर्च के समर्थन से वाममोर्चा को कितना फ़ायदा होगा ये तो चुनावों के परिणाम ही बताएँगे.
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