राज्य सरकार ने इस बार हिमाचल प्रदेश मे बने क़ानून की तर्ज़ पर नया क़ानून बनाने का काम शुरु कर दिया है लेकिन अल्पसंख्यक संगठनों ने कानून बनाने के इन प्रयासों का विरोध किया है.
राज्य के गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया ने बीबीसी से कहा, "जब हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार ऐसा कानून बना सकती है तो हम क्यों नहीं. इसमे क्या ग़लत है, इस मामले मे विधि विभाग कानूनी पहलुओं को देख रहा है".
उधर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इसका ये कहकर विरोध किया है कि इस क़ानून का दुरुपयोग करके अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न किया जाएगा.
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ की कविता श्रीवास्तव कहती हैं, ''हमें लगता है कि राज्य सरकार अपने हिंदूवादी एजेंडे पर काम कर रही है, हमें ऐसा कोई कानून मंजूर नहीं जो किसी की धार्मिक आज़ादी पर प्रहार करता हो. ऐसा करना अनैतिक और मानवाधिकारों के विरुद्ध होगा".
दूसरी ओर विश्व हिंदू परिषद् जैसे संगठनो ने इसका सवागत किया है और कहा है कि वो काफी समय से सरकार से ऐसा क़ानून बनने की माँग कर रहे थे.
राजस्थान विश्व हिंदू परिषद के अवधेश पारीख कहते हैं, ''सरकार को धर्मांतरण रोकने के लिए कड़ा कानून बनाना चाहिए क्योंकि कुछ संगठन गरीब लोगों को दूसरे धर्मो को अपनाने का प्रलोभन दे रहे है, ऐसा कानून बनने से जबरन धर्मांतरण नही हो सकेगा".
विरोध
मुस्लिम वीमेन वेलफेयर सोसाइटी की निशात हुसैन कहती हैं, "हमने पहले भी इन प्रयासों का विरोध किया था, अब भी हम विरोध करेंगे क्योंकि पड़ोस के गुजरात में इस कानून का इस्तेमाल अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के लिए किया जा रहा है".
राजस्थान क्रिश्चियन फेलोशिप के फादर रेमंड कोहेलो कहते हैं कि वो अभी इस प्रस्तावित कानून के बारे में पूरी जानकारी लेकर ही कुछ कह सकते है.
वे कहते हैं, "हमारी राय में सविंधान के विरुद्ध कुछ नही होना चाहिए, इससे पहले सरकार ने दो साल पहले ऐसा ही कानून बनाया था और उसे विधानसभा से पास करवाकर राज्यपाल के पास भेजा था लेकिन तत्कालीन राज्यपाल प्रतिभा पाटिल ने इसे सरकार को वापस विचार के लिए भेज दिया था".
राजभवन ने पुराने विधेयक पर कई आपत्तियाँ की थी, इसमे मूल धर्म में लौटने पर कानून लागू नहीं होने और धर्मांतरण, बल और कपटपूर्ण जैसे शब्दो पर ऐतराज किया गया था. हिमाचल का कानून पुराने विधेयक की तुलना मे थोड़ा नरम माना जाता है.
सरकार की चली तो आने वाले विधानसभा सत्र में इस क़ानून को पास कर दिया जाएगा. कुछ प्रेक्षक मानते है कि सरकार विधानसभा चुनावों से पहले वोटों का धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण करना चाहती है.
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